Awara Masiha - A Vagabond Angel

एक भटकती आत्मा जिसे तलाश है सच की और प्रेम की ! मरने से पहले जी भरकर जीना चाहता हूं ! मर मर कर न तो कल जिया था, न ही कल जिऊंगा !

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हिन्दू .....मूर्ति क्यों पूजते है ? ...

Posted On: 3 Mar, 2017 Religious में

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कहते है इन्सान या जीव की जो खूबी या विशेषता होती है वही उसके अंत यानी पतन का कारण भी होती है …इतिहास गवाह है ..की रावण जो अपने समय का इक बहुत ही विद्वान और बड़ा साधक था अंतः अपनी विद्या और साधना के द्वारा पाए यश , बल और ज्ञान के अहंकार के कारण अपने ही पतन का कारण बना …..

अगर आज हम अपने हिन्दू समाज को देखे तो शायद हम महसूस कर पाए ..हम भी धीरे धीरे उसी पतन के रास्ते की और अग्रसर है और इसकी वजह है की …हमने अपने ज्ञान या सभ्यता के विकास का सही उपयोग नहीं किया …..

आखिर क्यों आज का हिन्दू इक डरपोक ,मतलबपरस्त , लालची और चापलूस बनके रह गया है ?…..

आखिर गीदड़ जैसी चापलूसी , शतुरमुर्ग की तरह सर झुकाना और स्वानो की तरह पैरो में लौटने की कला क्यों और कैसे इस धर्म के लोगो के खून में समा गई ?

कभी आपने सोचा है आखिर क्यों , हम किसी मूर्ति के आगे खड़े होकर उसकी आरती उतारते है ?

अगर हम गौर से देखे तो क्या है आरती या पूजा या वंदना …सिर्फ चापलूसी भरे शब्दों का भंडार ….की आप किसी का गुणगान करे और वोह प्रसन्न होकर आपके मन की कोई इछापूर्ति कर दे ….बिना मेहनत के कुछ पाना आखिर कहाँ तक तर्कसंगत है ?

अगर हम इतिहास को थोडा सा खोद कर देखे तो शायद हम समझ पाए …की मूर्ति पूजा का चलन हिन्दू समाज में क्यों और कैसे शुरू हुआ ?….

अगर आप देखे तो दुनिया में कुछ शहर ,किसी विशेष धर्म के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण और श्रधा के तीर्थ है ..चाहे वोह मक्का मदीना , अजमेर शरीफ, जेरुसलम , शिरिडी , अयोध्या , मथुरा , काशी , अमृतसर आदि आदि …गौर करने लायक बात यह है ….की इन सभी स्थानों पे किसी दिव्य पुरुष/समाज सुधारक का जन्म या मरण हुआ था और कालांतर में उसके अनुनायी ने उस दिव्य पुर्ष के आदर्शो पे उस धर्म की स्थापना की …..

जो महान आत्मा अपने समय में लोगो की भलाई के लिए नेक कार्य करती रही ..लोगो ने उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें याद रखा ….अब मुस्लिम और इसाई धर्म में ..किसी के मरने के बाद उसे कब्र में दफना दिया जाता है …तो किसी महान आत्मा के मरने के बाद जिस स्थान पे उसे दफनाया गया …वोह स्थान उस धर्म के अनुयायी के लिए इक पवित्र स्थान हो गया …..कालांतर में लोगो ने उस दिव्य आत्मा के जन्म स्थान को भी पवित्र स्थान का दर्जा देकर वंहा पे किसी स्मारक या ईमारत का निर्माण करवा दिया …….

मुस्लिम और इसाई धर्म के लोग अपने आदर्श या अपने धर्म की दिव्य आत्मा को समय समय पे याद करने के लिए उनकी समाधी पे एकत्रित होते और उनके जन्म/मरण स्थल पे आकर उनके जैसे आदर्श अपने जीवन में अपनानाने की शपथ लेते या जीवन में किये अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते …..धीरे धीरे माफ़ी मांगने और उनके अनुकरण करने का चलन इतना बढ़ा की कुछ लोगो ने उनके आदर्शो का पालन करने की शपथ के बजाये  अपनी इछाये को पूरा करने का जरिया बनाकर इन स्थानों पे आना शुरू कर दिया ….धीरे धीरे ये स्थान इन धर्मो के पवित्र स्थल बनगए …..

अगर हम हिन्दू सभ्यता के विकास को समझे तो यह बात आसानी सी देखी , समझी और परखी जा सकती है …की सिन्धु घाटी में जन्मी सभ्यता , उस समय की और सभ्यता से अपने समय में कोसो आगे थी …

जंहा यूरोप और खाड़ी में लोग सिर्फ कच्ची(मिटटी की बनी ) या लकड़ी से बने घरो या ईमारतो में रहते थे… वन्ही सिन्धुघाटी के लोग पत्थरों को काट कर , मिटटी को पकाकर उनसे अपनी ईमारत और घर बनाते थे  ….

सिन्धु घाटी के रहने वाले लोग इस कला के जनक थे ….कालांतर में सिधु घाटी में रहने वाले लोग आगे चलकर हिन्दू कहलाये ….आने वाले वर्षो में पथरो को काट कर उसका उपयोग करने की कला ने ”शिल्प कला” का जन्म दिया …आज भी अजन्ता अलोरा , खुजराओ की गुफाये अपनी यह बात बड़ी मजबूती से रखती है ..की शिल्प कला का वाह दौर अपने स्वर्ण काल में था ….

यूरोप और खाड़ी के देशो में लोग मरने के बाद उसे दफना दिया करते थे ….पर हिन्दू धर्म में मरने के बाद उसको जलाने का रिवाज है/था … ऐसे में मरे हुए लोगो को याद रखने के लिए उनकी मूर्ति का निर्माण करवा दिया जाता था … ऐसी किसी आस्था या विश्वास के तहत ना होता था ..यह सब इक तरह का रूटीन था ..की किसी के मरने के उपरांत उसकी छवि को कैसे याद रखा जाए….

आज भी हमें शहरो , गावों के चोराहो में ऐसी अनेको मूर्तियाँ मिल जायंगी जो ..अपने वक़्त के किसी सेठ , साहूकार , धनवान , राजा , प्रशासक या नेता की होगी ….

उस वक़्त के राज महाराज और धनवान लोग अपनी मूर्ति किसी चोराहो , समारक , महल या हवेली जैसे स्थानों पे लगवाते ..और कभी कभी कुछ शिल्पी अपनी इछा और कल्पना से कुछ अलग तरह की मूर्ति भी बनाते जो किसी व्यक्ति विशेष की ना होकर शिल्पी की इक कल्पना मात्र होती  …जैसी चित्रकार कभी हकीकत तो कभी कल्पना से अपनी भावनाए चित्र के माध्यम से दर्शाता है ….अब जरुरी तो नहीं की चित्र में दिखलाई गई छवि हकीकत में हो ही …

हिन्दुओ की शिल्प कला ने दुनिया को इक से इक नायब स्मारक , मूर्तियाँ , कला सी सजी गुफाये दी …. जो मूर्तियाँ शुरू शुरू में सिर्फ इक कला की तरह और किसी को मरने के उपरांत सिर्फ याद भर रखने के लिए बनाई जाती थी ….कालांतर में वही मूर्ति धर्म के प्रतिक में तब्दील हो गई ….

जैसा की मेने पहले लिखा की दुसरे धर्मो में किसी महान आत्मा की कब्र या सूली को अपने धर्म का प्रतिक बनाया वही हिन्दुओ ने कुछ महान आत्मा की मूर्ति को अपने धर्म का प्रतिक बना लिया …

अगर हिन्दू अपने धर्म ग्रंथो(वेदों) को देखे तो उसमे मूर्ति पूजा का कंही जिक्र नहीं मिलता …. प्रारम्भ में हिन्दुओ में सिर्फ साधना या तपस्या का चलन था ..जिसका अर्थ था ..मैं अपने दुर्गुणों का त्याग करने के लिए प्रयत्नशील हूँ और तब तक साधना करूँगा जबतक मैं अपनी दुर्बलता का नाश नहीं कर लेता …

तपस्वी ,साधक या साधू संत की तपस्या करते वक़्त अपने सामने किसी इष्ट देव की मूर्ति ना होती थी ….अपितु वोह सिर्फ अपना ध्यान लगा कर अपने संकल्प को पूरा करने का प्रयास करता था …

जैसा की और धर्मो में आया की लोग अपने धर्म गुरु के समारको पे आकर अपने दुर्गुणों को दूर करने का संकल्प लेते या गुनाहों की माफ़ी मांगते ..ऐसा ही चलन धीरे धीरे हिन्दू धर्म में अपने इष्ट देव की मूर्ति के आगे होने लगा …..लोगो को तपस्या या साधना करने से आसन किसी मूर्ति के समक्ष अपने गुनाहों की माफ़ी मांगना ज्यादा आसन और सुविधाजनक लगता …

यंहा पर आने वाले वक़्त में हिन्दू और दुसरे धर्मो के अंदर इक भिन्नता आई ..जन्हा मुस्लिम और इसाई धर्म में लोग अपने धर्म का प्रचार वय्कित्गत रूप से करते ..वन्ही हिन्दू धर्म में प्रचार का माध्यम या अपने इष्ट देवता की अधिक से अधिक मूर्ति स्थापित करने और मोखिक रूप से उनका गुणगान करके होने लगा …

हिन्दुधर्म के दो महाकाव्य इस बात की पुष्टि करते है …की मोखिक रूप से उपासना को क्रमबद्ध करके ही इनकी रचना सम्भव हुई …..इक में स्तुति तो दुसरे में अपनी कमजोरियों और बुराइयों को दूर करने का सन्देश है ….

आने वाले वक़्त में धर्म के प्रचार की लालसा ने मूर्तियों के निर्माण में अपना योगदान दिया  … तो मोखिक प्रचार में इष्ट देवता के गुणों का बखान करने के लिए अपनाये गए शब्द कालांतर में उनकी आरती के रूप में प्रचलित हो गए …..

अगर हम गौर से देखे तो आरती क्या है …सिर्फ किसी की बड़ाचढ़ा कर की गई गई प्रशंशा या चापलूसी ….हकीकत में जिसका उस व्यक्ति विशेष के द्वारा किये गए कार्यो से कोई लेना देना नहीं है …..

सच तो यह है की जिस मूर्ति को आप अपना ईष्ट देवता समझ पूजा अर्चना करते है वोह शायद किसी शिल्पी की कल्पना मात्र रही हो ….और जो आरती आप गाते है वोह किसी गायक के अपने शब्द भर है ….

हम इतिहास में दूर क्यों जाये ..रात भर चलने वाले देवी के जाग्रतो में फ़िल्मी गानों की तर्ज पे होने वाली आरती क्या यह समझाने के लिए काफी नहीं …की जो बोला जा रहा है ..वोह सिर्फ इक कल्पना मात्र है …

जब आप किसी मूर्ति के आगे खड़े होकर आरती गाते है ..वास्तव में वोह उस व्यक्ति विशेष की चापलूसी भर है और यह हम सभी जानते है की किसी की चापलूसी कब और क्यों की जाती है ..जब कोई इन्सान बिना मेहनत किये अपनी इच्छा पूर्ति करना चाहता हो….जब आप मेहनत करना ही नहीं चाहते तो ..देश और समाज का कल्याण कैसे हो ?

धीरे धीरे आरती गाते गाते कब हिन्दू धर्म के अंदर ..झूठा अभिमान , दंभ , लालच और डर ने अपना घर जमा लिया की उन्हें पता भी ना चला ….धीरे धीरे हिन्दू इक डरपोक , कायर , मतलबपरस्त और लालची होता गया ….इसका परिणाम यह हुआ की हिन्दूओ पे मुगलों और दुसरे धर्म के आक्रंताओ ने अनेको हमले किये और उनपे अनगिनत अत्याचार किये …..

अपने इष्ट देवता का गुणगान करते करते ..हिन्दुओ के कुछ राजाओ और धनवानों के अंदर भी अपने ईष्ट देवी देवताओ की तरह अपनी स्तुति यानी गुणगान करवाने के स्वपन ने जन्म लिया …कंश , हिरन्यकश्यप आदि कुछ ऐसे उधारन दिए जा सकते है ….

अलग अलग शिल्पकारो ने अपनी अपनी कल्पना से नए नए देवी देवताओ को जन्म दिया और उनके गुणगान करने के लिए …गायकों और वादकों ने उनकी पूजा करने के लिए अपने मन से उनके गुणों का खूब बढ़ा चढ़ा कर गुणगान किया …जो कालांतर में उनकी आरती बनके रह गई …..

आप किसी भी देवी देवता की आरती को पढ़ ले वोह क्या है ..सिर्फ उनकी छवि के बारे में बढ़ा चढ़ा कर किये गए गुणगान ….आखिर किसी को याद करने या उसके गुणों को अपनाने के लिए उसकी लिए चापलूसी भरे शब्दों को बोलने का क्या अर्थ ?

अगर हम किसी दिव्य आत्मा का चरित्र अपनाना चाहते है या अपने गुनाहों का प्रायश्चित करना चाहते है उसके लिए साधना की आवश्यकता है ना की पूजा या आरती की ….पर हम तो बिना मेहनत किये कुछ पाना चाहते है …

किसी वक़्त जो मूर्ति किसी समाज सुधारक या धनवान या राजा को सिर्फ याद भर रखने के मकसद से बनाई जाती थी ..वही मूर्ति आगे चलकर धर्म का प्रतिक बनके रह गई …

अगर हम आज भी देखे तो भारत में मृत्यु के बाद नेताओ , धनवान या समाज सुधारक  की मूर्ति बनाकर किसी स्मारक या चोराहे पे लगाई जाती है …..अगर हम गौर से देखे तो समझ पायंगे की चारो तरफ फैला भ्रस्टाचार , अहंकार , चापलूसी क्योकर हिन्दुओ में समा गए ? कल के त्यागी साधक , समाज सुधारक आजके भ्रष्ट और लालची समाज के प्रतिक बनके रह गए …

किसी ऑफिस या दफ्तर में काम से ज्यादा बॉस की चमचागिरी या जी हजुरी का होना और ऐसा करने वाले व्यक्ति विशेष का सफल होना क्या हिन्दू धर्म का आधुनिक रूपांतरण तो नहीं ?

इसका इक उधारण आज के भारत में किसी इक विशेष नेता का अपने मंत्रिकाल में राज्य में अपनी मूर्ति स्थापित करना भी है …..आखिर क्यों ? क्योकि उस  नेता के मन में कंही ना कंही अपनी स्तुति करवाने की अभिलाषा छिपी थी …की शायद कालांतर में लोग उसे भी और देवी देवताओ की तरह पूजने लगे …

इक नेता के ऊपर तो उसके राज्य के लोगो ने “**चालीसा “ तक बना दी …क्या इससे बढ़कर चाटुकारी , चापलूसी की मिसाल किसी देश या समाज में है ? जंहा लोग अपने थोड़े से फायदे के लिए किसी के पैरो में गिर जाते है …. तो बड़े अपना अहंकार पूरा करवाने के लिए छोटो से अपने पैर छुवाते है या लोग अपने मतलब के लिए या दुसरे के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए उनके पैरो में गिरकर अपने को धन्य समझते हो …

जब आप अपनी गर्दन सीधी करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते ….अपना स्वाभिमान किसी के पैरो में रख दे …फिर आप कैसे इक ईमानदार , नैतिक देश की कल्पना कर सकते है ?…

अंत में मूर्तियो का निर्माण जो ..किसी व्यक्ति के अच्छे कर्मो और गुणों को याद करने और उसके आदर्श अपनाने के मकसद से बनाई गई थी ..वोह उसकी चापलूसी में आरती के साथ उसकी पूजा के रूप में परिवर्तित हो गई …..

अगली बार जब आप किसी मूर्ति की वंदना या पूजा या आरती करे तो ..अपने आप से पूछे की आप उस मूर्ति से क्या पाने चाहते है ?….जो उसका गुणगान कर रहे है…

क्या आप में इतनी हिम्मत , धैर्य और ताकत है की उसके आदर्श अपनाने के लिए आप वर्षो की इक कठिन साधना करना चाहेंगे या फिर उसका दो पल का गुणगान ?…..

फैसला आपका है ….

By

Kapil Kumar

Awara Masiha

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental”. The Author will not be responsible for your deeds.



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