Awara Masiha - A Vagabond Angel

एक भटकती आत्मा जिसे तलाश है सच की और प्रेम की ! मरने से पहले जी भरकर जीना चाहता हूं ! मर मर कर न तो कल जिया था, न ही कल जिऊंगा !

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मुक्ति !

Posted On: 4 Mar, 2017 Junction Forum में

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एक बार की बात है। एक भगवान का भक्त था उसका भक्ति करने का अंदाज निराला था। वह मन ही मन अपने प्रभु का ध्यान कर प्रसन्नचित्त हो जाता और पूर्ण आनंद की प्राप्ति करता। सारे आडम्बर से दूर यह भक्त न तो प्रभु की ‘साधना’पूजा या आरती करता,न ही प्रभु को कोई भोग लगाता,ना ही प्रभु के आगे दुःख में गिड़गिड़ाता या सुख में दान पुण्य करता। वह हमेशा  प्रभु के प्रेम में लीन रहता।

उसकी यह भक्ति-प्रेम देख प्रभु प्रसन्नचित्त होते पर आश्चर्यचकित भी होते। ना जाने कैसे भगवान को अपने इस भक्त पर संदेह हो गया की उनका भक्त उन्हें सच्चा प्रेम नहीं करता है और भगवान इंसानी भावनाओ में बह भक्त की परीक्षा लेने धरती पर जा पहुंचे। उन्होंने देखा,उनका भक्त बड़े ही मनोभाव से उन्हें प्रेम कर रहा है। प्रभु को अपने भगवान होने का संदेह हुआ। उन्होंने सोचा,मैंने इस भक्त को आज तक कुछ नहीं दिया और न ही इसने मुझसे कुछ माँगा तो यह कैसा भक्त है जो बिना किसी आशा के मुझे  प्रेम कर रहा है!जितना वह अपने भक्त को देखते उतना ज्यादा भगवान को अपने ऊपर शक होता और उनका मन उनसे पूछता। ‘क्या मैं प्रेम करने के योग्य हूँ?’

जब भगवान् की व्याकुलता इतनी बढ़ गयी की उन्हें अपने भक्त के ‘निर्मल’ प्रेम पर संदेह ही नहीं हुआ अपितु, उन्हें  पूरा यकीन  हो गया की मेरा यह भक्त सिर्फ दिखावा कर रहा है और इस अनजाने भय से भयभीत हो, उन्होंने भक्त के सामने जाकर स्थिति का अवलोकन करना उचित समझा। भगवान एक रूपवती स्त्री का रूप धारण कर अपने भक्त के पास पहुँच गये। भगवान् स्त्री वेश में बोले-हे! आर्यपुत्र मैं इक अबला नारी हूँ , मैं अपने पति से प्रेम नहीं करती पर सामाज के भय से उसे ऊपर से प्रेम करने को विवश हूँ अगर मैं उसे प्रेम न करूँ तो वह रुष्ट होकर अत्याचारी हो जाता है तब मेरा धर्म मुझे धिक्कारता है, अगर अपने पति से प्रेम करूँ तो मेरी आत्मा मुझे कचोटती है। मैं कहां जाउं और क्या करू? और कौन है जो मुझ अबला को इस जन्म में निस्वार्थ प्रेम करे, क्या तुम इसके योग्य हो? कृपा करके तुम मेरा मार्ग दर्शन करो।

स्त्री (प्रभु) की पीड़ा समझ, भक्त बोला-हे! देवी तुम इस जन्म में अपने संस्कारो और धर्म की वजह से अपने पत्नी धर्म से बंधी हो, अगर तुम उससे आजाद होकर मेरे पास आना चाहो तो मैं उसके लिए बिना शर्त तैयार हूँ पर उसके लिए तुम्हे अपने पत्नी धर्म का त्याग करना होगा। अगर किसी कारणवश तुम ऐसा करने में विफल होती हो, फिर भी मैं तुम्हारी  सहायता करूँगा तुम्हारे धर्म का सम्मान करते हुए, मैं हर तरह से तुम्हारी सहायता करने के लिए उपलब्ध हूं।

भगवान यह सुनकर मन में प्रसन्नचित्त हुए पर उनका संशय न गया। वह बोले-हे!आर्यपुत्र, मैं तो अपने पति से निर्बाध प्रेम करती हूँ तुम मुझे अपनी बनाकर मेरा धर्म भ्रष्ट करना चाहते हो! तुम कैसे प्राणी हो? भक्त की स्थिति विचित्र हो गयी। अगर वह ‘स्त्री’की सहायता  करे तो उसके प्रेम का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता, कुछ नहीं करे तो मनुष्यता का दमन हो जाता, उसे लोग पत्थर दिल समझते और स्त्री की गरिमा समाज में कम हो जाती। बहुत सोच विचार के भक्त बोला- ‘हे देवी’ तुम मेरे घर में देवी बन कर रह सकती हो और जिस तरह मैं अपने प्रभु से प्रेम करता हूँ उतनी ही निष्ठा से तुमसे करूँगा। मैं तुम्हारा ‘उपासक’बन कर रहूँगा। जिस दिन तुम्हे मेरा आचरण अपने धर्म से सर्वोपरि लगे उस दिन तुम मेरा ‘कल्याण’करके मुझे मेरा धर्म बता देना, ऐसा कह भक्त चुप हो गया।

भक्त के इतना कहते  ही, अचानक भगवान का स्त्री रूप विलीन हो गया और भक्त के सामने प्रभ����� प्रगट हो गए और भक्त से बोले- हे! मानव तूने यह कैसा प्रेम किया ? मैंने तेरा अपमान किया तुझे बुरा-भला कहा और तेरी निष्ठा पर सवाल उठाया फिर भी तूने  निर्भय होकर अपने प्रेम का परिचय दिया और मुझे अपनाया। यह कैसा प्रेम है? भक्त बोला-प्रभु प्रेम तो ‘आत्मा’ से किया जाता है। मैंने आपसे प्रेम जगह,स्थिति या शरीर की प्रमानिकता के आधार पर नहीं किया। अगर आप स्त्री न हो कर कुछ और होते तो भी मैं आपका वरण करता परन्तु उस स्थिति में मेरा संबध आपसे कुछ अलग होता, संबध तो सामाजिक स्थिति का परिचायक मात्र है!पर प्रेम इन सबसे ऊपर है यह किसी समाज या संबध से नहीं बंधा!

शरीर से धर्म निभाया जाता है!आप किसी धर्म में पैदा हों यह आपका भाग्य है,पर उस धर्म को पूजना यह उस धर्म के प्रति आपकी आस्था है और मेरी आस्था,धर्म और पूजा तो सिर्फ प्रेम है वह चाहे प्रभु हो या मानव!मैंने आपसे और समस्त मानव जाति से प्रेम किया है, अगर आपका कोई शारीर न भी होता तो भी मेरे प्रेम में या निष्ठा में कोई कमी न होती,आप साकार है या निराकार या कुछ और प्रभु और भक्त तो सिर्फ ‘आत्मा’ के बंधन से बंधे है उन्हें किसी रूप, लावण्य या किसी भी प्रकार के आडम्बर की आश्यकता नहीं है। अपने भक्त की यह बात सुन प्रभु प्रसन्न हुए और अपने असली रूप में आ गये उनका असली रूप देख भक्त चौक उठा!

उसने कल्पना भी न की थी जिस ‘बोधिसत्व’ का उसने अनजाने में त्याग  कर दिया था वही बोधिसत्व उसे इस रूप में वापस मिल गए। अचानक फूलों की वर्षा हुयी और एक आवाज आई ‘बोधिसत्व’ और भक्त ‘कपिल’ का कल्याण हुआ।  भक्त कपिल बड़ा विचम्भित हुआ बोला-हे! प्रभु मुझे तो आपने ‘मुक्ति’की शर्त में बांध दिया था पर आप कौन से बंधन में बंधे थे।

‘बोधिसत्व’ बोले-जब मैं ,तुम्हे अकेला छोड़ अपनी हठधर्मिता के कारण चला गया तो मुझे ज्ञान  हुआ की मैंने तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया और उसका प्रयाश्चित यह था की मैं इक हठधर्मी  नारी के रूप  में जन्म लेकर अपनी पति दुरा पीड़ित स्त्री के जीवन याचना को लेकर तुम्हरे पास जाऊं अगर तुमने बिना कोई ‘आडम्बर’ किये बिना अपनी ‘आस्था’ खोये मुझे स्वीकार कर लिया तो मेरा प्रायश्चित और तुमारी मुक्ति दोनों संभव हैं। आज तुम इस मनुष्य जीवन से मुक्त हुए! ऐसा कह प्रभु (बोधिसत्व ) और भक्त (कपिल) अर्न्तध्यान  हो कर ब्रह्माण्ड में विलीन हो गए और इस तरह इस जन्म से भक्त ‘कपिल’ की मुक्ति  हो गयी।

BY

Kapil Kumar

Awara Masiha



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