Awara Masiha - A Vagabond Angel

एक भटकती आत्मा जिसे तलाश है सच की और प्रेम की ! मरने से पहले जी भरकर जीना चाहता हूं ! मर मर कर न तो कल जिया था, न ही कल जिऊंगा !

181 Posts

3 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 25540 postid : 1318451

वक़्त बड़ा बेरहम होता है !! ...

Posted On: 10 Mar, 2017 Junction Forum में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

इन्सान भी इक अजीब किस्म का जानवर है …जिसकी याददाश्त किसी चींटी से भी कम होती है …देखने , सोचने और परखने में यह झूठ लगे …पर जब वक़्त बदलता है तो यही इन्सान अपनी असली फ़ितरत दिखाता है की ..उसकी याददाश्त वाकई में कितनी कम है …..

आज कुछ सोचते सोचते बचपन में पढ़ी इक कहानी याद आगई ..जिसमे इक कौवा और गिलहरी दोनों दोस्त होते है और ठण्ड की भूखमरी में दोनों आने वाले वक़्त में खेती करना का सपना संजोते है …जब तक ठण्ड रहती है …दोनों के इरादे अटल रहते है ..पर जैसे ही वसंत आता है कौवा अपनी फ़ितरत से मजबूर अपनी आँखे फेरने को मजबूर हो जाता है ….

जब जब गिलहरी उसके पास खेती के लिए आती है ..जैसे जमीन की गुड़ाई , बीज बोना , फसल में पानी डालना और फसल काटना  आदि ..कौवा कभी वंसंत के मौसम के सरुर में ..तो कभी गर्मी की धुप में आम के पेड़ो की छांव में… तो कभी पतझड़ में पकती फसल को देख यही सोचता है की ..उसे मेहनत करने की क्या जरुरत है ..सब कुछ ठीक है और हर बार वोह गिलहरी को यह कहकर टकरा देता है ….की …

“तू चल मैं आता हूँ चुपड़ी रोटी खाता हूँ …हरी डाल पे बैठा हूँ और ठंडा पानी पीता हूँ”….

बेचारी गिलहरी हर बार अपना टका सा मुह लेकर रह जाती और कौवा उसे देख हंस देता …पर वक़्त बदलता है ..जब कड़ाके की ठण्ड में कौवा भूखा प्यासा दाने दाने को भटकता है …..

यह कहानी हमें यह बताती है की जब इन्सान का अच्छा वक़्त होता है तब वोह सब कुछ आसन समझता है और बुरे वक़्त का ख्याल करना ही नहीं चाहता ….अब देखने की बात यह है की जब सूर्य उदय या अस्त होता है …दोनों समय सूरज लाल रंग का और पूरा दीखता है ..दोनों ही स्थिति में सूर्य इकसा है पर दिशा का फर्क आने वाले समय को निर्धारित करता है ..की पूरब से उगने वाले सूरज के बाद दिन और पश्चिम में डूबने वाले सूर्य के बाद रात आएगी …

पर इन्सान इन छोटी छोटी बातो को अपने जीवन में समझ कर भी अनजान बनता है ….

जब देश की इकॉनमी अच्छी होती …लोगो के रोजगार और नौकरी अच्छी स्थिति में होती है तब लोग थोड़ी सेविंग्स करने के बजाय अनाप सनाप खर्च करने के , इधर उधर इन्वेस्ट करने के लिए अपने सर पे काफी लोन भी ले लेते है …वोह यही समझते है की अब बुरा वक़्त कभी नहीं आएगा ….

मुझे याद है सन 2000 में अमेरिका में रहने वाले मेरे दोस्तों के पावं जमीन पर नहीं पड़ते थे उस वक़्त अमेरिकी इकोनोमी अपने स्वर्ण काल में थी …मामूली सा आदमी भी मिलियन से निचे बात नहीं करता था ..मेरे अधिकतर दोस्तों के बैंक में मिलियन प्लस के पोर्टफोलियो होते थे ….अधिकतर लोग सिर्फ उस नंबर को देख कर खुश होते थे …शायद किसी ने ही उस पैसे को बुरे वक़्त के सन्दर्भ में रख कर नहीं सोचा  ….सब का इक ही मोरल होता था …की जितना ज्यादा इन्वेस्ट करो उतना फायदा …वक़्त बदला और देखते ही देखते वोह पैसा सिर्फ याद बनके रह गया ……

फिर 2009 में इक ऐसा वक़्त भी आया जब अमेरिका की इकोनोमी ने इक लम्बा गोता खाया …अब वही सब लोग जो 2000 में हवा में उड़ते ना थकते थे …अपने पावं जमीन पे भी रखते हुए डरने लगे …

इसमें देखने और समझने की यह बात है ..दोनों ही वक़्त अधिकतर लोगो की नौकरी या कमाई पे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा था …मतलब सूर्य दोनों ही वक़्त इक जैसा था …बदले थे तो सिर्फ हालत और सोच ….कुछ लोगो के हालत बदलते ही अधिकतर लोगो का हौसला , हिम्मत और धैर्य …सब बदल गया …

मेने इन दोनों स्थितियों को बड़े गौर से देखा और इक बात जो मेने समझी की …इन्सान को अच्छे वक़्त में अपनी पूंजी को जमा करना और बुरे वक़्त में पूंजी का निवेश करना चाहिए …

सन 2009 में इक से बढ़कर इक गाडी के मॉडल डिस्काउंट पे मिलते …फर्नीचर को तो देखने वाला भी नसीब ना था और घर , जमीन का कोई खरीदार दूर दूर तक नजर नहीं आता था …लोगो नौकरी और बचत को लेकर इतने डरे हुए थे ..की अधिकतर रेस्तौरेंट , सिनेमा हाल खाली नजर आते …

इसके विपरीत 2000 में बाजार में हर जगह मारा मारी होती थी …कोई भी चीज खरीदने जाओ ..उसके ओने पोने दाम चुकाने होते थे …..

यंहा पर यह सब कहने का सारांश यह है …की आज भारत में इकोनोमी का सूर्य अपने पुरे तेज में और जनता जोश और खरोश में है …कोई यह समझना और सोचना भी नहीं चाहता की हालत हमेशा इकसे नहीं रहते …यह सूर्य भी कभी अस्त होगा …

जन्हा अमेरिका में 2002 और 2009 आए दिन कमनियां लोगो को अपनी बैलेंस शीट सही करने के नाम पे फायर कर देती थी वन्ही ऐसी भी कम्पनिया थी जिन्होंने अपने वफादार कर्मचारियों की छंटनी तब भी नहीं की जब की वोह घाटे में चल रही थी….

जिधर देखो लोगो का हुजूम पैसा फेकने को तैयार है …आसमान छुती रियल एस्टेट …अपने पीक पे चलता शेयर बाजार और रोज रोज नयी उभरती कम्पनियां …सबको इक ही सन्देश देती मिलती है …की यह सुनहरा दौर कभी ख़त्म नहीं होगा …..रोजागर की लोगो को कमी नहीं ..इसलिए कोई भी कर्मचारी इक कम्पनी के साथ ज्यादा समय तक जुड़ना नहीं चाहता ..थोड़े से जायदा पैसे जन्हा मिले ..लोग तुरंत फुरंत नौकरी बदल लेते  है ..वोह यह भूल जाते है बुरे वक़्त में ही असली कम्पनी और वफादार मुलाजिम की पहचान होती है ….

जबकि हमें प्रकृति हर दिन यही सन्देश देती है की …हर उगने वाले सूरज के साथ ढलने वाला सूरज साथ होता है ….जीब बात यह है की देखने में दोनों इकसे लगते है …जन्हा सूर्य उदय के वक़्त इन्सान आंखे खोलना नहीं चाहता ..वन्ही डूबता सूरज को देख वोह आँखे बंद करना नहीं चाहता …

यह भी इक कडवी हकीकत है..की हर सूर्य का उदय अपने अस्त को साथ लेकर आता है

आज भारत में लोगो की आमदनी जितनी बढ़ी है उससे ज्यादा उनके खर्चे बढ़ गए …आज से १० / १५ साल पहले तक किसी विरले के गले ही लोन नाम का फंदा गले में होता था ….आज जिसे देखो इक नहीं दो ..दो तीन तीन फंदे …जैसे  होम , गाडी और इन्वेस्टमेंट प्रॉपर्टी लोन लिए आसनानी से घूम रहा है ..हर कोई यही समझता है की …अब कभी बुरा वक़्त आयेगा ही नहीं ….

उसपे नेता और बाजार के सट्टे बाज आम जनता को यही सब्जबाग दिखाते रहते है ..की खूब खर्च करो और नए नए लोन लो …”अभी अच्छे दिन आने वाले है “ ….तो अब तक क्या बुरे दिन चल रहे है/थे ….

पिछले १० सालो में सरकारी से लेकर सार्वजनिक दोनों ही स्थान पे कर्मियों की तनखा में जबरदस्त इजाफा हुआ है ….जिन लोगो के पास कल तक स्कूटर नहीं था आज उनके घर गाडी होना मामूली बात है …जिन घरो में कभी फोन की घंटी तक नहीं बजी थी ..आज सबके हाथ में कई कई मोबाइल है ….जिस देश की जनता ने कभी किसी फ़ास्ट फ़ूड रेस्तौरेंट का नाम ना सुना था ..आज वोह उनकी रोजाना का इक भोजन है  ….

क्या इसके बाद भी जनता को अपने दिन बुरे लगते है… तो शायद उन्हें अपने बुजर्गो के साथ थोडा वक़्त गुजरना होगा …. पर यह सब हो किस कीमत पे रहा है ..सब लोग इक से बढ़कर इक कर्जदार हो रहे है ..यही इकोनोमी साइकिल  अमेरिका की 2005 की रियल एस्टेट के बूम की तरह है ..जिसमे सब कुछ रोसी था …हर कोई खुश था जब तक इकोनोमी के ताश का महल भरभरा कर नहीं गिरा था ….

वैसे ही आज आम भारतीय कौवे की भांति लोन लेकर ऐश कर रहा है  और सोच रहा है की यह मौसम हमेशा ऐसा ही रहेगा …..

कोई भी यह समझने या सुनने के लिए तैयार ही नहीं की ….किसी भी चिन्गुम को इक लिमिट के बाद नहीं खिंचा जा सकता …..वैसे ही कोई भी इकोनोमी हमेशा एवरग्रीन नहीं रहती …जापान , अमेरिका , ग्रीक , अर्जेंटीना , इटली आदी ऐसे ना जाने कितने ही उदाहरन हमारे  सामने है …

इतिहास गवाह है …की जब सब कुछ परफेक्ट लगे ….तब उसके बाद तस्वीर में रंग भरने से उसमे सिर्फ बदसूरती ही आती है …..

आज केंद्र में इक स्थिर सरकार है ….इक जनप्रिय नेता इस देश का प्रतिनिधि है …देश की इकोनोमी की रफ़्तार भी भली भांति है …देखने में सब कुछ बड़ा रोज़ी है जैसे की सन 2000 और 2007 में अमेरिका में था ….

पर उसके बाद इकोनोमी का फाल इक डोमिनो फाल की तरह हुआ …फिर उसके बाद क्रेडिट डिफ़ॉल्ट और कैश क्रंच की नोबत आई …तो इकोनोमी की सुनामी , बैंक के दिवालियापन के साथ ,लोगो के होसले को भी बहा कर ले गई …लोग इक इक पैसा खर्च करने में सोचने लगे ….कल तक जिस रियल एस्टेट को खरीदने के लिए , लोग लाइन लगा कर खड़े होते, बैंक घर पे लोन देता था ….उन्हें कोई देखने वाला भी नसीब ना होता ….बाजार में हर चीज आसानी से और बड़े ही बाजिब दामो पे मिलती …

मेने इस अनुभव से इक लेसन लिया की अच्छे वक़्त में पैसा जोड़ना और कम से कम खर्च करना चाहिए …बुरे वक़्त में उसी पैसे को इन्वेस्ट करना और ऐशो आराम पे खर्च करना चाहिए ..क्योकि बुरे वक़्त में आपको हर जगह वी आई पी सेवा मिलती है और इन्वेत्स्मेंट के बेहतर आप्शन भी …..

पर भारत में जनता चढ़ते सूरज को देख कर यही  समझती है ….की इकोनोमी के इस सूर्य का कभी अस्त नहीं होगा …..मुझे डर है ..की ..अगर यंहा पर क्रेडिट डिफ़ॉल्ट और कैश क्रंच की स्थिति पैदा हो गई तो …अगर कंही ऐसा हुआ तो यह देश फिर से इतिहास के पन्नो में फिर से ना सिमट जाए ..जैसा की हमने इतिहास में पढ़ा था …की ..भारत कभी इक सोने की चिड़िया था ….

इसलिए ..आप आज जितनी हो सके बचत या जमा करे ….नए इन्वेस्ट करने का वक़्त लगभग ख़त्म होने के कगार पर है …..इस सूर्य को उदय हुए दस साल से ज्यादा हो चुके है …इसका अब धीरे धीरे अस्त होना निश्चित है …प्रकृति हमें यही समझती है …की सम्झादरी यही है ..की रात आने से पहले घर में दिया जला लेना चाहिए …ढलते सूरज से रौशनी की उम्मीद बेमानी होती है ….

पर लोग रात के बाद जैसे दिन निकलने पे उसे मानने को तैय नहीं होते और अलसाये से बिस्तर पे पड़े रहते है वैसे ही डूबता सूरज को देख लोग मानने को तैयार नहीं होते की ..आने वाली रात कितनी काली या लम्बी हो सकती है …

अंत में ….हो सके तो अपने ऊपर किसी तरह का लोन ना रखे या उसे जबतक अच्छा वाट है पूरा चुकता कर दे ….ताकि बुरे वक़्त आने पर आके सर पे कोई दूसरा बोज ना हो और उसका असर आपके ऊपर ना हो ….

पर आज शायद सबको यह गाना ज्यादा सुविधाजनक लगे …

“तू चल मैं आता हूँ …चुपड़ी रोटी खाता हूँ “  ..और….तू जा अपना काम कर ….

Kapil Kumar

Awara Masiha

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental”. The Author will not be responsible for your deeds.




Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran