Awara Masiha - A Vagabond Angel

एक भटकती आत्मा जिसे तलाश है सच की और प्रेम की ! मरने से पहले जी भरकर जीना चाहता हूं ! मर मर कर न तो कल जिया था, न ही कल जिऊंगा !

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संस्कार या अन्धविश्वास ?

Posted On 10 Mar, 2017 Social Issues में

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मुझे यह तो मालूम नहीं इक इंसान जन्म से पहले क्या हो ता है और मरने के बाद क्या

(अगर पूर्व या अगला जन्म जैसी कोई चीज भी है )   हाँ इतना जरुर समझता हूँ , जो भी दर्द , ख़ुशी , गम होता है वोह सिर्फ इस शारीर ,आत्मा (मन और दिल ) को सिर्फ इस जन्म में होता है ,क्या पुन्र जन्म के नाम पर या मरने के बाद स्वर्ग जाने के नाम पर या  अगले जन्म के नाम पर इस जन्म को जहनुम से बदतर विषाद से भरपूर जीना जरुरी है ?

क्या पूरा शारीर सिर्फ इसलिए सड़ने दे , क्यानोकी इक हाथ या पैर को काटने में तकलीफ होती है या उसके बैगर जीना थोडा मुश्किल हो जाता है ? या यह अज्ञान है जो इस फैसले के खिलाफ यह सोच के  जाता है की ऐसा करना ही इक गुनाह है ।

क्या हम जिन्दगी भर कुछ खाई हुई कसमो के नाम पर इक सड़े हुए रिश्ते को सिर्फ इसलिए ढोते रहे की उसे ढोना हमारा धर्म है

5;्या इक ताजी हवा का झोका जिन्दगी भर के लिए इक सपना बन कर रह जाये ? क्या इस खुशनुमा पयार के झोके के लिए हम ता उम्र तरसते रहे ? क्या किसी के पैर की जूती तब तक बने रहे जब तक पैर उसमे फिट होने के काबिल न हो जाये ?

कुछ दिन पहले की बात है , मुझे अपने छोटे लड़के के साथ इक हफ्ता स्काउट की  कैम्पिंग के लिए , शहर से 200 K.M दूर स्काउट ग्रुप के साथ वीरान जंगल में गुजारने के लिए जाना पड़ा । यह कैंप ग्राउंड स्काउट ट्रेनिंग के लिए स्पेशल रूप से डेवेलोप किया गया था । यंहा पर आपको सिर्फ इक तम्बू में अपने बच्चे के साथ रहना था दिन में बच्चे अपनी ट्रेनिंग के लिए जाते, आप उनके साथ वंहा रहते । यह कैंप आधुनिक जीवन की सभी सुविधाओ से मुक्त था , शाम होते ही चारो  और  अँधेरा छा जाता , इलेक्ट्रिसिटी का प्रयोग कैंप ग्राउंड में नहीं था । 40oC की गर्मी में बिना A.C, पंखे  के रहना अपने पे दिन दहाड़े  जुल्म करना था |

उस पर , खाने के नाम पर सिर्फ सलाद और फल (शाकाहारी के लिए )और बाथरूम और टॉयलेट तो 18 वि शताब्दी के थे |वंहा हर दिन में कल्प कल्प के गुजार रहा था  इक दिन मेरी बात चित सुरेश जो की अपने साथ दो बच्चे लेकर आया था से हुई| उससे पहले थोड़ी  बहुत बात चित हुई थी |पर उसे ज्यादा जानने का मौका नहीं मिला था |जन्हा में रोज कलपता रोता, वोह सारी असुविधाओ को बड़ी ख़ुशी ख़ुशी लेता और हमेशा खुश और दुसरो की मदद करने के लिए तैयार रहता ।

उसकी यह हंसी ख़ुशी मुझे हैरान करती और अपने पर लज्जित भी ।

इक दिन मेने उससे कहा, तू अपने दोनों बच्चो के लेकर आया है , उन्हें पूरा तैयार करना , देखना और सारी एक्टिविटीज कराना कितना बड़ा काम है । तेरी बीवी तो तुझसे बहत खुश रहती होगी ! उसने हँसते हुए कहा, नहीं ,यार !

“ऐसा कुछ नहीं है ”    सब घरो में इक ही तरहा का झगडा है ” मुझे इस जवाब की कतए आशा न थी ।

मेने उससे पुछा, तेरा भी झगडा होता है क्या ? वोह हंसा हाँ क्यों नहीं ? ऐसे ही मेने कहा ,कभी हाथा पाई भी हुई है?

यह बड़ा ही वाहियात सवाल था , पर मेने तो पूछ लिया , अब लगा की उसे बुरा लग जायेगा । पर वोह बोला भाई मैं उसे टच नहीं करता वोह ही अपने हाथ पैर चला देती है ।

उसने हँसते हुए कहा, इक दिन तो उसने मेरे पर चाकू चला दिया । मुझे विश्वास नहीं हुआ ,तो उसने अपनी कमीज हटा कर दिखाई । तब भी विश्वास नहीं हुआ ,तो उसके बड़े लड़के ने जब अपनी गर्दन दूर से हिलाई तो समझ गया, की जो वोह कह रहा था सब सच था ।

अब चोकने की बारी मेरी थी , कैसे और क्यानो ? मेने हैरानी वाले भाव से पुछा !

सुरेश बोला , कुछ नहीं ऐसे ही इक दिन वोह किचन में काम कर रही थी , उसने मुझे कुछ लाने के लिए बोला और मेने ध्यान नहीं दिया , जब कई बार बोलने पर उसे जवाब नहीं मिला , तो उसे बहुत गुस्सा आ रहा था , और मैं किसी काम से जब किचन में आया तो उसने अपना हाथ चला दिया “

उस वक़्त शायद वोह सब्जी काट रही थी । और चाकू ने मेरी गर्दन के पास इक बड़ा कट मार दिया ।

फिर क्या हुआ, मेने उत्सुकता से पुछा ! कुछ नहीं यार , इमरजेंसी में गया और डॉक्टर को बोला ऐसे ही काम करते कट गया, पर डॉक्टर को कुछ शक हुआ और उसने पुलिस को बुला लिया ।

अब पुलिस ने बच्चो और बीवी से पूछ तो उन्हें सब पता चल गया और वोह बीवी को पकड़ अपने साथ स्टेशन ले गई । फिर क्या हुआ मेने जिज्ञासा से पुछा ?

फिर मुझे ही जाकर उसकी जमानत देकर लाना पड़ा ।

उसके बाद तो सब ठीक होगया होगा , कोई झगडा वगहरा तो नही हुआ होगा , मेने पुछा !

वोह बोला , अरे कान्हा , दो दिन ठीक, फिर वैसा ही ।

बच्चे तो कहते है डैडी इससे दूर जन्हा चलना है हम तुम्हारे साथ चलने को तैयार है । फिर तुमने उससे “तलाक” क्यानो नहीं लिया मेने हैरानी से कहा ?

तुन्हें तो बहुत आसानी से मिल जाता , और न ही तुम्हे उसे गुजरा भत्ता देना पड़ता और न ही इसमें समय लगता ।

वोह हंसा और  बोला , यार , यह तो जन्मो का बंधन है , अब इसे छोड़ के कान्हा जाये ?  हम अपने को सुधर ले यही बहुत है , मैं तो सारे काम खुद कर लेता हूँ , अपना खाना बनाना , बच्चे तैयार करना , उन्हें पढ़ना आदि आदि  की घर में झगडा न हो ।

इस “तलाक – सालक” से कुछ होने वाला नहीं , यह तो मेरे  पुराने जन्मो का पाप है जो इस जन्म में चूका रहा हूँ ।

अगर इस जन्म में भाग गया तो अगले जन्म में फिर वही करना पड़ेगा ।

उसके इस जवाब ने मेरे सामने इक प्रशनचिंह लगा दिया ?

क्या “तलाक” लेना जुर्म है या संसकर के खिलाफ ?

हम कब तक अपने संस्कारों की दुहाई के नाम पर घरलू हिंसा , शोषण और प्रताड़ना का शिकार होने वाली नर – नारी को सहने के लिए छोड़ देंगे  ?

जब इक मर्द इतना दब्बू है या सीधा , तब इक नारी की इस समाज में क्या हालत होती होगी ?

क्या हम नारियों को यह इन डायरेक्ट मेसेज नहीं दे रहे , की पति तो परमेश्वर है , चाहे वोह मारे – पिटे , किसी दूसरी औरत को रखे उसे सात जन्मो का बंधन समझ निभाओ ।

तुम्हे उसे छोड़ने के बजाय अपने अन्दर सुधार लाना है ताकि इक दिन वोह भी सुधर जाये ?

कितनी बड़ी विडम्बना है जब इक मर्द इतना दकियानूसी है तो समाज में रहने वाली औरत का क्या हाल होगा ?

जब इक मर्द अपने को संस्कारों के नाम पर दी  गई बेडियो को तोड़ने में नाकाम,

तब कितना मुश्किल है उन लोगो को समझाना जो , हमारे संस्कारों और परम्पराओ के नाम पर सिर्फ अपने पुरानवादी परम्परा को सिर्फ  इसलिए घसीट रहे है की ऐसा धर्म शाश्त्रो में लिखा है|

यह संस्कार है या अन्धविश्वास इसका फैसला आपको करना है !

Kapil Kumar

Awara Masiha

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.’ ”



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